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बादशाह मेले में मनमाने ढंग से तब्दीली करने से पहले जैसी रंगत नहीं
लेखक - वासुदेव मंगल

बादशाह मेले में बादशाह के साथ वजीर का किरदार करने वाले शख्श भी उनके बांयी तरफ की गद्दी पर बैठते है। 
इस मेले में बीरबल का किरदार पुष्करणा ब्राहम्ण करते आये है। सन् 1905 से लेकर सन् 1994 तक श्री ईशरदास जी व्यास बीरबल का किरदार करते रहे। 
सन् 1905 से 1932 तक उनके दादा सन् 1933 से 1963 तक उनके पिता ने व सन् 1964 से 1994 तक ईशरदास जी व्यास स्वयं ने बीरबल का किरदार किया। 
वास्तव में 1994 तक यह मेला एक दैविक मेला होता था जिसमें बीरबल इस मेले का मुख्य आकर्षण होता था। वास्तव में इस मेले की धूरी बीरबल होता है, जिसको भेरू जी का ईष्ठ आने पर अदम्य शक्ति के साथ यहाँ तक कि रात्रि को 11 बजे मेले के पश्चात् सारी रात व दूसरे दिन प्रातः 10 -12 बजे तक पूरे ब्यावर शहर की परिक्रमा करते हुए हर आस्थावान मेलार्थी जो बीरबल का मुजरा करवाने वाले के घर नृत्य जिसमें मोरिया और घूमर नृत्य कर मुजरा करते थे। मुजरा करवाने वाले व्यक्ति अपनी श्रद्धा अनुसार बीरबल को नजराना भेंट करतें। यह एक शकुन होता था। बीरबल भंग के नशे में अदम्य शक्ति के साथ पूरे मेले का आर्कषण होता था। 
अब यह सब कुछ दर्शकों को देखने के लिए नहीं मिलता है। मेले के तुरन्त बाद उपखण्ड परिसर से ही बीरबल अपने घर चला जाता है। जिससे शकुन की यह सौगात भी मेलार्थी को नसीब में नहीं है। 
इतना ही नहीं अब तो बादशाह मेले के रवानगी व लौटने वाले रास्ते में भी आमूलचूल परिवर्तन मनमाने तरीके से कर दिया गया है। अमला मार्ग की जगह एस बी आई बैंक मार्ग व ललन गली मार्ग की जगह भगत चैराहा, नगर परिषद मार्ग कर बादशाह की सवारी अग्रसेन भवन पर ही समाप्त कर दी जाती है। जो कि एक अपशकुन है। क्योंकि बादशाह अकबर ने बादशाह टोडरमल की सवारी को अपनी महल से आरम्भ की थी और पूरे आगरा शहर की परिक्रमा के बाद पुनः अगवानी भी अपने महल में ही की थी। बादशाह की सवारी रास्ते में नहीं ऊतारी जाती है और न ही उसका मार्ग बदला जाता है क्योंकि परम्परा के अनुसार बादशाह की सवारी के साथ रास्ते में आने वाले घरों के दर्शक बादशाह के साथ गुलाल खेलकर के उनकी आरती उतारते थे जो अब देखने को नहीं मिलती है और न ही उन्हे बदशाह की गुलाल रूपी खर्ची मिलती है। 
चूंकि यह मेला एक रजिस्टर्ड डिड (पंजीकृत दस्तावेज) के जरिये सम्पन्न होता था। यह मेला चूंकि शाही मेला होता था। इस मेले में नोबत, ठण्डाई, सींघाडे़ के आटे की गुलाल का खर्चा बहुत होता था, इसलिये इस मेेले को बावन सरार्फा दूकानदार ही परस्पर आर्थिक सहयोग से आयोजित करवाते थे जिसमें अग्रवाल, ओसवाल, सरावगी, माहेश्वरी, खण्डेलवाल, विजयावर्गी, ब्राह्मण इत्यादि होते थे। 
परम्परानुसार बादशाह मेले में उस दिन के बादशाह के किरदार को तय करने के लिये खुल्ली बोली लगती थी, जो अब देखने को नहीं मिलती है। अब तो समाज के लोग मनमाने ढंग से इस मेले को आयोजित करते है। जिससे इस मेले का आर्कषण साल दर साल कम होता जा रहा है। 
दो-तीन साल पहले तो उपखण्ड कार्यालय परिसर पर बादशाह और उपखण्ड अधिकारी के मध्य गुलाल रूपी युद्ध में बादशाह की सवारी वाले ट्रक में उपखण्ड अधिकारी की तरफ से बादशाह के साथ गुलाल फैंकते हुए आग लग गई थी। जिसमें ट्रक पर सवार सभी लोग जख्मी हो गये थे। यह इसलिए हुआ कि उपखण्ड अधिकारी के मंच पर परम्परा के नियमों की अवहेलना के कारण कालबेलिया नृत्य करवा दिया था जिससे घासतेल मिली गुलाल के साथ उपखण्ड अधिकारी की तरफ से बादशाह की सवारी पर गुलाल की पूडि़या फैंकने से बादशाह की सवारी के ऊपर लगे हुए हाईलोजर की गर्मी से गुलाल ने आग पकड़ ली। 
अतः आयोजनकत्र्ताओं को बादशाह मेले की निश्चित परम्परा के अनुसार ही यह मेला आयोजित किया जाना चाहिये और मेले में आतिशबाजी भी नहीं होनी चाहिये। 
मेले में निखार लाने के लिए परम्परागत कार्य-प्रणाली ही अपनाई जानी चाहिए। यह मेला राजस्थान का एक प्रमुख पर्यटन मेला है। जिसको देखने के लिये और बादशाह से गुलाल रूपी खर्ची लेने के लिए दूर-दूर से लोग आते है। अतः मेले की शाही परम्परा को बरकरार रखते हुए मेले का आयोजन किया जाना चाहिये। चूंकि बादशाह टोडरमल जाति से अग्रवाल बतलाये जाते हैं। अतः इस मेले की जिम्मेदारी अग्रवाल समाज ने वहन की थी। लेकिन कुछ साहित्य की दृष्टि से बादशाह टोडरमल जाति से खत्री भी बतलाये जाते है।
लेकिन अब समय बदल गया है, मेले का आकार व बढ़ती हुई आबादी व ब्यावर के विस्तार को देखते हुए यह मेला बहुत उपयोगी हो गया है। अतः इसमें समय के अनुसार पूरे शहर की भागीदारी का ख्याल रखना बहुत जरूरी हो गया है। इसलिये इस मेले का आयोजन स्थानीय प्रशासन को अपने हाथ में ले लेना चाहिए। अब यह मेला अग्रवाल समाज के नियंत्रण से बाहर हो गया है। जिससे इस मेले की शालीनता में सालों-साल गिरावट आती जा रही है। अतः यह एक सोचनीय प्रश्न है जिस पर गंभीरता से मनन करने की आवश्यकता है। 
स्थानीय अग्रवाल समाज द्वारा सारे ब्यावर शहर से बादशाह मेले का चंदा एकत्रित किया जाता है तो यह एक पूरे शहर का बादशाह मेेला हुआ। जिसमें पूरे शहर के लोग भागीदार होते है। अतः ये लोग यह उम्मीद लगाते है कि बादशाह की सवारी निश्चित मार्ग से होकर गुजरेगी तब हमको भी बादशाह रूपी गुलाल की खर्ची नसीब होगी। यहां तक कि तेलीयान चैपड़ पर व उसके पहले बालाजी के स्थान पर हजारों लोग बादशाह की सवारी देखने के लिए और गुलाल रूपी खर्ची लेने के लिए लालायित रहते थे। परन्तु अब चूंकि बादशाह की सवारी अग्रसेन भवन पर ही उतार दी जाती है। अतः पाँच बजे से रात्रि को ग्यारह बजे तक यह नजारा देखने को नहीं मिलता है। अब इस सवारी का समय 3 बजे से कर दिया गया है जो बहुत जल्द समय है क्योंकि उस समय जीनगर समाज की कोड़मार होली का समय होता है। और तेजाजी के थान के पास तेलीयान समाज की गैर नृत्य भी 3 बजे से 5 बजे तक होती है। अतः बादशाह मेले का समय सांय 5 बजे से रात्रि 11 बजे तक ही अनुकूल है और बीरबल का नृत्य भी शहर की परिक्रमा के साथ पहले की तरह ही होना चाहिए। जिससे आस्थावान अपने घर पर बीरबल का मुजरा नृत्य करवाकर उसे नजराना भेंट कर सके। 
अब तो गुलाल भी बालू मिट्टी में कलर दी हुई आती है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से खराब है और आंखे भी जल जाती है। पहले सिंघाडे के आटे की गुलाल आती थी, उसके बाद अरारोट के आटे की गुलाल आती थी। अब तो बालू मिट्टी में कलर दी हुई गुलाल आती है। इसके साथ ही अब तो पीसा हुआ पत्थर कई रंगों में मिला हुआ आता है जिससे आँखों को हानि पहुँचती है। 
यह परम्परा सैंकड़ों वर्षाें से चलती आयी है अब मेले में मनमानी क्यों अपनाई जा रहीं है। अब समय आ गया है स्थानीय प्रशासन को इस मेले के बढ़ते हुए आकर्षण और महत्व को देखते हुए इसके प्रबन्ध और आयोजन की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले लेनी चाहिये। इस मेले में कोई एंकर नहीं होना चाहिए। चूंकि सब की आर्थिक भागीदारी से यह मेला भरवाया जाता है। अतः सब को इस मेले के आनन्द के लिये सम्मिलित किया जाना चाहिए। न कि किसी एक समाज की मनमानी होनी चाहिए। 
चूँकि लेखक स्वँय बादशाह मेले में छः बार सन् 1978, 86, 87, 88, 90 व 91 में बादशाह का किरदार बखूबी कर चुका है। इसलिये प्रत्यक्षतः प्रायोगिक व व्यवहारिक तौर पर तजुर्बे के आधार पर यह मेला एक दैविक मेल हुआ करता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसकी शालीनता, भव्यता व महत्व पर आयोजन समाज द्वारा मनमाने ढंग से विकृति पैदा कर दिये जाने से इसका महत्व साल दर साल खत्म होता जा रहा है। अतः प्रशासन श्रीमान् उपखण्ड अधिकारी से गुजारिश है कि इसके अतीत के गौरव को बनाये रखे। 

ब्यावर के प्रसिद्ध बादषाह मेले में सन् 1851 से लेकर 2013 तक बादषाह का किरदार (अभिनय) करने वाले षख्ष की सूची
लेखक - वासुदेव मंगल
1. श्री नवलराम खुरपा
2. श्री कन्हैयालाल पौद्धार
3. श्री रामनाथ राशन वाले
4. श्री नारायण पुत्र श्री रामनाथ 
5. श्री रणछोड़दास अग्रवाल 
6. श्री प्रहलाद प्रशाद छिपियावाला
7. श्री धनश्याम कचोरी वाले
8. श्री बृजमोहन अग्रवाल
9. श्री नाथूलाल हलवाई (कचोरी वाले) 
10. श्री रामलाल हाण्डा (हलवाई)
11. श्री रामचन्द्र पुत्र श्री रामलाल
12. श्री बाबूलाल घी वाले 
13. श्री हनुमान प्रसाद सर्राफ
14. श्री वासुदेव मंगल
15. श्री नारायण जी राशन वाले
16. श्री शम्भू गुरू 
17. श्री भँवरलाल जी गर्ग
18. श्री चिन्टू साईकिल वाले
19. श्री मदनलाल मास्टर
20. श्री निलेश गर्ग (अलवर वाले) 
21. श्री बाल किशन मित्तल
22. श्री कैलाश मित्तल
23. श्री रोशन सिंहल पुत्र श्री बाबूलाल घी वाले

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